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भोजन के लिए भूख हड़ताल ।

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आज विश्व भर में अधिकांश ऐसे राष्ट्र है जिन्होंने इस बात पर सबसे अधिक महत्व दिया कि समाज को बेहतर बनाने की दिशा में सबसे अधिक सराहनीय कार्य कौन से हैं। जब भी राष्ट्र के लिए कोई "कट्टरपंथी समाज", "विचारधारा" और व्यक्ति चुनौती बन जाता हो, ऐसे में राजनीति को चाहिए कि देश और "अन्य समाज" के हित में ऐसे फैसले लिए जाएं जिनके नतीजे भले ही दूरगामी ना हो परंतु समाज के अन्य सभी वर्गों के हित में हो। क्या हमने भारत में ऐसी राजनीतिक व्यवस्था कहीं भी देखी है। नहीं, हमने तो भारत को भोजन के लिए भूख हड़ताल करते देखा है और अक्सर देखते हैं। क्या हमने रोटी के लिए बच्चों को सड़कों पर भीख मांगते नहीं देखा है। क्या हमने एंबुलेंस के अभाव में मरीज को कंधों पर जाते नहीं देखा है। क्या हमने राजनीतिक अव्यवस्था के कारण लाखों लोगों को पैदल अपने घर की तरफ जाते नहीं देखा।

अहिंसा और 21वी सदी

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पश्चिम में एक कहावत है "ईश्वर ने सबको समान नहीं बनाया मिस्टर कोल्ट ने बनाया है" और आज 21वीं सदी में यह सच लगता है, हथियार नहीं होने से दुनिया हिंसक थी बहुत से अन्याय और अत्याचार कमजोर वर्ग पर किए जाते थे, जैसे ही हथियार की खोज हुई विश्व में शांति की स्थापना हुई, लोगों ने समानता के स्वाद को महसूस किया। आखिर हम विश्व शांति ही तो चाहते थे युद्ध तो हमने कभी चाहा ही नहीं। अब सवाल है कि उस इंसान ने ऐसा क्यों कहा "विश्व शांति के लिए युद्ध जरूरी है बाकी सब कुछ हासिल कर सकते हैं आप सत्य और अहिंसा से।"  सवाल बहुत से उठते हैं और जवाब हम खुद ढूंढ सकते हैं, एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि * क्या आतंकवाद की लड़ाई सत्य और अहिंसा से लड़ी जा सकती है? इस सवाल का जवाब आप पाकिस्तान से या फिर हाफिज सईद से मांगेंगे उसका जवाब "हां" में ही होगा। लेकिन बजाय इसके आप दुनिया में किसी भी समझदार व्यक्ति से या वर्ग से यह सवाल पूछेंगे तो वह कहेगा "नहीं"। अगर सच में ऐसा है आतंकवाद की लड़ाई हम अहिंसा से नहीं लड़ सकते तो आज 21वी सदी में हम गांधी को कितना सास्वत मानते हैं। ...

एक आदर्श विपक्ष की तलाश और आज की राजनीति।

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विश्व भर में जब भी राजनीति की बात होती है प्रत्येक व्यक्ति अपने उच्च महत्वाकांक्षाओं को साधने में लग जाता है। वे लोग अपनी अपनी उच्च महत्वाकांक्षाओं के साथ आसमान की तरफ चल देते तो समस्त विश्व में ऐसा कौन सा पद है जिसे वह हासिल न कर सकते मगर सवाल है कि वह ऐसा करते क्यों नहीं? क्योंकि वे लोग अरस्तु होते हैं, वे बिस्मार्क होते हैं, वे चाणक्य होते हैं। वे लोग ऐसा कभी नहीं करते, इसके बारे में कभी सोचते भी नहीं। हम ऐसे बहुत से नाम और जानते हैं जिन्होंने जीवन राजनीति को समर्पित किया मगर कभी राजनीतिज्ञ नहीं हुए बल्कि वे सिर्फ मार्गदर्शक रहे। भारत की एक और बहुत बड़ी विडंबना यह है कि यहां फिजिक्स पढ़ने वाले फिजिसिस्ट, केमेस्ट्री पढ़ने वाले केमिस्ट, बायोलॉजी पढ़ने वाले बायोलॉजिस्ट और राजनीति को कभी नहीं पढ़ने वाला भी राजनीतिज्ञ और फिर उच्च महत्वकांक्षी तो है ही। मेरा लेख ऐसे लोगों के लिए है जो राजनीति को नहीं समझते या कम समझते हैं सक्रिय राजनीति में आना चाहते हैं या आ चुके हैं, लेकिन सबसे अधिक जो राजनीति के माध्यम से सत्ता को हासिल करना चाहते हैं हमने हमेशा ही यह देखा है सत्ता कैसे चला...

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